
10 वर्ष के संघर्ष का मिला रिजल्ट
3 जनवरी 2003 को सुबह 6 बजे टाटा मूरी एक्सप्रेस जालंधर सिटी रेलवे स्टेशन पर पहुंचती है। प्लेटफार्म नंबर एक पर गाडी खडी होती है। उस वक्त चारों ओर घने कोहरे की सफेद परत दिखाई दे रही थी। दस फलांग दूर खडे यात्री नजर नहीं आ रहे थे। मै अपना रिबॉक कंपनी का बैग उठाया और नीचे उतरा। चूंकि मै पहली बार जालंधर सिटी पहुंचा था इसलिए हमें ज्यादा कुछ जानकारी नहीं थी। ठंड इतनी अधिक थी कि आंख नांक से पानी निकल रहे थे। इससे बचने के लिए एकमात्र सहारा गर्मा गरम चाय थी, जिसकी उस समय जरूरत भी थी। हम चाय की रेहडी की ओर बढे, लेकिन वहां पहले से ही बहुत भीड थी। लोग चाय से लबालब गिलास को दोनों हाथों के बीच कैद करके चुस्कियां ले रहे थे। मैने भी बोला भैया एक कप चाय देना। आसपास खडे लोग पलट कर मेरी ओर बडे आश्चर्य से देखे। सभी लोग सरदार थे इसलिए उसमें से एक ने तबाक से बोल दिया कि भैया आ गया। मै वहां की भाषा पंजाबी से अनभिज्ञ था, लिहाजा हमें कुछ समझ में नहीं आया। खैर, चाय पीने के बाद बगल में ही मौजूद पूछताछ खिडकी पर पहुंचे, जहां मैने डारमेट्री के लिए पूछा। वहां मौजूद रेलवे बाबू से हमने हिंदी में कहां भाई साहब हमें दो दिन ठहरना है, क्या डारमेट्री मिल जाएगी। बाबू ने अपनी महिला सहकर्मी से हंसकर बोला---लो एक और भैया आ गया। हमने सोचा शायद यहां के लोग भैया सम्मान स्वरूप बोलते होंगे। खैर उन्होंने किराया लिया और चौबीस घंटे के लिए एक बिस्तर दे दिया। इसके साथ ही मै अखबार के स्टाल पर पहुंचा और एक दैनिक जागरण व अमरउजाला खरीदा। उसके बाद कमरे में चला गया। दो घंटे लगाकर मैने दोनों अखबारों को चाट डाला। इससे अंदाजा लग गया कि वहां छपने वाले अखबारों में खबरें कैसे होती हैं और किन शब्दों का क्या मतलब होता है। उसी दिन शाम को पांच बजे मैं दैनिक जागरण के फोकल प्वाइंट कार्यालय पहुंचा। वहां समाचार संपादक श्री कमलेश रघुवंशी से मुलाकात की, जहां उन्होंने कल से ज्वाइन को कहा। साथ ही कहा कि कल श्री मनोज तिवारी जी से आकर मिल लेना। शनिवार का दिन था। मै बहुत खुश हुआ और नई पारी शुरू करने के पहले भगवान के दर्शन कर रेलवे स्टेशन के उपर बने डारमेट्री में जा पहुंचा। रातभर इंतजार करता रहा कि कब सुबह होगी और मै नौकरी की शुरुआत करूंगा। पंजाब में काम करने की उत्सुकता हिलोरे मार रही थी। सुबह हुई और मै अखबार के स्टाल पर पहुंच गया। दैनिक जागरण खरीद कर लाया और पूरा अखबार बारीकी से चाट डाला। दोपहर के 12 बजते ही तैयार होकर फोकल प्वाइंट के लिए रिक्शा थाम लिया। आधे घंटे में रिक्शा दैनिक जागरण के गेट पर पहुंचा। वहां पहुंचने पर पूरा ढांचा समझा। कई चीजें हमें नई लग रही थी। उस वक्त अधिकारी कोई नहीं थे। डेस्क पर हिमाचल प्रदेश का अखबार तैयार करने वाली टीम जुटी थी। वहां जयंत शर्मा से मुलाकात हुई। वह हिमाचल के प्रभारी थे और बडे हंसमुख इंसान हैं। अपना परिचय दिया और उनके काम को देखने लगा। चूंकि मुझे डेस्क का अनुभव नहीं था, इसलिए हम डेस्क की बारीकियां समझने लगे। दूसरे दिन हम अपने पारिवारिक मित्र जसवीर सिंह बडैच के घर पहुंचे। वहां उनके छोटे भाई और पंजाब के सबसे बडे हास्य कलाकार गुरप्रीत सिंह घुग्गी से मुलाकात हुई। उनका पूरा परिवार पंजाबी बोल रहा था। एकाध लोग ऐसे थे जो हमारे साथ हिंदी बोलने का प्रयास कर रहे थे। उनकी भाषा हमारे पल्ले नहीं पड रही थी और हमारी हिंदी उनके। बावजूद इसके खाने के टेबल पर जब हम बैठे तो घुग्गी से पूछा कि यहां लोग भैया क्यों बोलते हैं। वह हंस पडे, बाकी लोग भी हंसे लेकिन कोई उत्तर नहीं दिया। तब तक काफी रात हो चुकी थी। घुग्गी ने कहा रात यहीं रुक जाईये लेकिन हमने कहां नहीं हम स्टेशन पर बने सरकारी गेस्ट हाउस जाएंगे। खैर, घुग्गी की मम्मी और पापा हमें स्टेशन छोडने आए। मुझसे रहा नहीं गया और हमने फीर पूछा कि आखिर भैया क्यों बोलते हैं। उन्होंने एक बार लम्बी सांस खींची और बोला कि उत्तर प्रदेश एवं बिहार से आने वाले लोगों को यहां भैया बोला जाता है, चाहे वह सब्जी वाला हो या आईएएस। मुझे सच्चाई समझने मे देर नहीं लगी और मेरा दिमाग सीधे जालंधर से मुंबई पहुंच गया। क्योंकि मुबंई में भी बसे यूपी के लोगों को वहां भैया कहा जाता है। मुबंई की सेम स्थित पंजाब की है जहां हिंदी बोलते ही लोग भैया कहने लगते है। वहां ज्यादातर लोग पंजाबी बोलते है। अगर ज्यादा पढे लिखे है तो अंग्रेजी, लेकिन हिंदी में बोलना अपमान समझते थे। मुझे लगा तो बुरा लेकिन मै कर भी कुछ नहीं सकता था, क्योंकि पंजाब में पंजाबी भाषा ही बोली जाती है। हां भारत सरकार के दफ़तरों में कुछ किया जा सकता था, लिहाजा मैने मन में ठान लिया कि हिंदी के लिए कुछ करना जरूरी होगा। तीन साल किसी तरह से जालंधर बिताने के बाद अम्रितसर संस्करण की शुरुआत हुई, जहां हमें गुरुनगरी रिपोटिंग में भेज दिया गया। इस बीच मै पंजाबी पूरी तरह से समझने लगा था और टूटी फूटी पंजाबी भाषा बोलने भी लगा। अम्रितसर जालंधर से ज्यादा पंजाबी बोली जाती है। लिहाजा मै अपने लोगों में पंजाबी बोलने की कोशिश करता था, इसलिए की हमें भी यह भाषा आ जाए। बाकी हिंदी के लिए संघर्ष करता रहा। मुझे रेलवे, कारोबार की बीट मिली। रेलवे चूंकि भारत सरकार का महकमा है, इसलिए वहां हिंदी अनिवार्य है। लेकिन कोई भी कर्मचारी हिंदी में काम नहीं करते थे। मैने पहले पूरा ढांचा समझा और एक एक विभागों के खिलाफ छेड दिया अभियान। भारतीय जीवन बीमा निगम, राष्ट्रीय बैंक, इनकम टैक्स सहित सभी विभागों के खिलाफ हिंदी में काम न करने के लिए जबरदस्त काम किया। इस बीच भारत सरकार की हिंदी राजभाषा संसदीय टीम वहां पहुंची। मैने उनके समक्ष यह मुददा उठाया कि यहां लोग न तो हिंदी में काम करते हैं और न ही हिंदी में बोलते हैं। यहां तक कि रेलवे स्टेशन के पूछताछ काउंटर पर बैठे कर्मचारी भी पंजाबी में बात करते हैं। सांसदों ने इसपर रेलवे को फटकार भी लगाई। एक दिन तो अजीब वाक्या हो गया। एक एयरहोस्टेज इंस्टीट़यूट में अभिनेत्री नेहा धूपिया आई थी। कार्यक्रम कवर करने मैं पहुंचा। कमरा पत्रकारों से खचाखच भरा था। बैठने के लिए कुर्सी नहीं मिली, लेकिन सबसे पीछे खडे होने की जगह जरूर मिल गई। मै कुछ देर खामोश रहा, लेकिन जब नेहा धूपिया की आवाज कानों तक नहीं पहुंची तब मै बोला कि जरा तेजी से बोलिए। इसके बाद नेहा माइक से बोलने लगी। वह अंग्रेजी में बोल रही थीं। लिहाजा मैने उन्हें हिंदी में बोलने को कहा। इतने पर आयोजक बीच में बोल पडे। मैने उनका जबाव देते हुए नेहा धूपिया से कहा कि आप तो अच्छी हिंदी बोल लेती हैं तो यहां अंग्रेजी क्यों बोल रही हैं। वैसे भी आप हिंदी से कमाते हैं, लेकिन बोलती हैं अंग्रेजी। इतना कहते ही सब खामोश हो गए और नेहा धूपिया हिंदी में बोलना शुरू हो गई। साथी कुछ पत्रकारों ने इसे ठीक कहा। बस इसके बाद हर जगह प्रेस कांफ्रेंस हो या सेमिनार हिंदी में बोलने पर दबाव बनाया जाता रहा। लोग बोलने भी लगे, लेकिन ऐसा लग रहा था कि जैसे लोग हिंदी में बोलना अपना अपना समझ रहे थे। खैर कुछ भी हो हमारा कारवां आगे बढता गया। इस बीच एक निजी इंश्योरेंस कंपनी की कांफ्रेंस में दो दिन मुझे शिमला जाने का मौका मिला। ग्रामीण इलाकों में कैसे जीवन बीमा लोगों तक पहुंचाया जाए और प्रोडक्ट बेचा जाए इसी पर चर्चा हो रही थी। कांफ्रेंस में लगभग सभी वक्ता अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे। एक दिन मै खामोशी से सुनता रहा। दूसरे दिन कांफ्रेंस के बीच में ही मै बोल पडा। कंपनी के अधिकारियों से छोटा सा सवाल किया कि आखिर आप जीवन बीमा का प्रोडक्ट पंजाब, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के गांवों में बेचने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन वहां तो लोगों को अंग्रेजी आती नहीं। अगर आप इसे हिंदी में बोलते तो क्या ठीक न होता। एकाएक तो किसी को समझ में ही नहीं आया कि आखिर मै बोल क्या रहा हूं। थोडी ही देर में कंपनी के उपाध्यक्ष (वाइस प्रेसीडेंट) जो बिहार से ताल्लुक रखते हैं, खडे होकर हिंदी में बोलना शुरू कर दिया। उन्होंने हमारे सवाल का सम्मान किया और बाकी सत्र हिंदी में ही बोला। सेमिनार खत्म होने के बाद सभी ने व्यक्तिगत रूप से मिलकर इसका समर्थन किया।
वैसे यह उनकी गलती नहीं है। क्योंकि आजकल के लोग हिंदी में बोलना ही अपना अपमान समझते है। यही कारण है कि वह आज भी अंग्रेजों के गुलाम हैं। अंग्रेज तो चले गए, लेकिन वह अपनी भाषा यहां छोड गए। हिंदी का परचम अम्रितसर में लहराने के बाद 9 दिसम्बर 2008 को मै देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गया। यहां भी मेरा सफर जारी रहा। दिल्ली में वैसे तो सभी भाषाओं का संगम है, लेकिन ज्यादातर वीआईपी एवं सरकारी अधिकारी अंग्रेजी में बोलते हैं। ऐसा नहीं कि यहां लोगों को हिंदी नहीं आती। सभी को आती है और घरों में बोलते भी हैं, लेकिन कार्यालया में बोलते वक्त अपमान समझते हैं। यहां तक कि वह कार्यालय में अंग्रेजी अखबार सजा कर रखते हैं। हिंदी अखबार भी लेते हैं, लेकिन उसे चोरी से पढते हैं। या तो बाथरूम में या फीर कार्यालय जाते समय गाडी में पढते हैं। दिल्ली में काबिज 80 फीसदी अधिकारियों के साथ यही आलम है। वह चोरी से हिंदी अखबार पढते हैं।
हिंदी क्षेत्र से जुडे लोग खुद हिंदी को पीछे ढकेल रहे हैं। लेकिन दैनिक जागरण ने काफी हद तक हिंदी को अपनाया है। यहां तक कि अंग्रेजी के शब्दों के इस्तेमाल तक पर पाबंदी लगा दी गई हे। यह एक अच्छा कदम है। हिंदी को बचाने के लिए जारी मेरे संघर्ष को उस दिन बल मिला जब राजधानी की एक निजी संस्था ने मुझे हिंदी पत्रकारिता का सम्मान दिया। दिल्ली के 'परिवर्तन जन कल्याण समिति' नामक संस्था ने राजधानी के मंडी हाउस स्थित त्रिवेणी कला संगम आडिटोरियम में 'हिंदी महाकुंभ व साहित्य सृजन सम्मान सम्मेलन -2009' का आयोजन किया। इस मौके पर मुझे हिंदी पत्रकारिता सम्मान से नवाजा। 10 वर्ष से हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने के बाद मिला यह सम्मान मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रखता है। सम्मान देने वाली हस्तियों भारत में मॉरीशस के उच्चायुक्त मुखेश्वर चूनी, पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय, भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त डा. जीवीजी क्रिष्णमूर्ति, कुरुकुल कांगडी के पूर्व कुलपति डा. धर्मपाल ने मुझे और मेरे संघर्ष को सलाम किया। साथ ही कहा कि हिंदी को जन जन की भाषा बनाने के लिए संघर्ष को जारी रखना होगा। मैने सिर्फ इतना कहा कि देश में लाखों लोग ऐसे हैं जो … हिंदी से कमाते हैं, लेकिन बोलते हैं अंग्रेजी।
वैसे यह उनकी गलती नहीं है। क्योंकि आजकल के लोग हिंदी में बोलना ही अपना अपमान समझते है। यही कारण है कि वह आज भी अंग्रेजों के गुलाम हैं। अंग्रेज तो चले गए, लेकिन वह अपनी भाषा यहां छोड गए। हिंदी का परचम अम्रितसर में लहराने के बाद 9 दिसम्बर 2008 को मै देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गया। यहां भी मेरा सफर जारी रहा। दिल्ली में वैसे तो सभी भाषाओं का संगम है, लेकिन ज्यादातर वीआईपी एवं सरकारी अधिकारी अंग्रेजी में बोलते हैं। ऐसा नहीं कि यहां लोगों को हिंदी नहीं आती। सभी को आती है और घरों में बोलते भी हैं, लेकिन कार्यालया में बोलते वक्त अपमान समझते हैं। यहां तक कि वह कार्यालय में अंग्रेजी अखबार सजा कर रखते हैं। हिंदी अखबार भी लेते हैं, लेकिन उसे चोरी से पढते हैं। या तो बाथरूम में या फीर कार्यालय जाते समय गाडी में पढते हैं। दिल्ली में काबिज 80 फीसदी अधिकारियों के साथ यही आलम है। वह चोरी से हिंदी अखबार पढते हैं।
हिंदी क्षेत्र से जुडे लोग खुद हिंदी को पीछे ढकेल रहे हैं। लेकिन दैनिक जागरण ने काफी हद तक हिंदी को अपनाया है। यहां तक कि अंग्रेजी के शब्दों के इस्तेमाल तक पर पाबंदी लगा दी गई हे। यह एक अच्छा कदम है। हिंदी को बचाने के लिए जारी मेरे संघर्ष को उस दिन बल मिला जब राजधानी की एक निजी संस्था ने मुझे हिंदी पत्रकारिता का सम्मान दिया। दिल्ली के 'परिवर्तन जन कल्याण समिति' नामक संस्था ने राजधानी के मंडी हाउस स्थित त्रिवेणी कला संगम आडिटोरियम में 'हिंदी महाकुंभ व साहित्य सृजन सम्मान सम्मेलन -2009' का आयोजन किया। इस मौके पर मुझे हिंदी पत्रकारिता सम्मान से नवाजा। 10 वर्ष से हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने के बाद मिला यह सम्मान मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रखता है। सम्मान देने वाली हस्तियों भारत में मॉरीशस के उच्चायुक्त मुखेश्वर चूनी, पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय, भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त डा. जीवीजी क्रिष्णमूर्ति, कुरुकुल कांगडी के पूर्व कुलपति डा. धर्मपाल ने मुझे और मेरे संघर्ष को सलाम किया। साथ ही कहा कि हिंदी को जन जन की भाषा बनाने के लिए संघर्ष को जारी रखना होगा। मैने सिर्फ इतना कहा कि देश में लाखों लोग ऐसे हैं जो … हिंदी से कमाते हैं, लेकिन बोलते हैं अंग्रेजी।
काश आपका तबादला दक्षिण में भी हो.
जवाब देंहटाएंमैं भी कोशिश करता हूं। समझाता हूं। पर लोगों के मन की धारणाओं को बदलने में शायद अभी भी वक्त लगेगा। दो बातें जो हमारे दिलों में गहरे पैठ गयीं हैं वह हैं कि हिंदी बोलते देख सामने वाला सोचेगा कि शायद मैं कम पढा लिखा हूं। दूसरे कि अंग्रेजी ना आने से उन्नति करना मुश्किल है।
जवाब देंहटाएंहिंदी को बढावा देने का जागरण का प्रयास प्रशंसा के योग्य है। उन हिंदी दैनिकों को भी इससे सबक लेना चाहिए जो कमाते तो हिंदी से हैं पर उनके सात-आठ अक्षरों में अंग्रेजी के तीन शब्दों का होना जरूरी होता है।
क़ायदे से देखें तो हिन्दीप्रेमियों को हिन्दी फिल्में देखनी ही नहीं चाहिए. पहले तो हिन्दुस्तानी ही इस दुनिय मे होते थे, जो निजी या सार्वजनिक बातचीत में हिन्दी बोलना पाप समझते थे. अब आयातित लोग हैं. भला वे क्यों हिन्दी बोलने लगे. ये अलग बात है कि सिनेमा में आने और स्टार बनने के पहले कई लोगों को एबीसी भी नहीं आती थी, पर स्टार बनते ही हिन्दी बोलने मे उन्हें तौहीन महसूस होने लगती थी. अब तो लोग विदेशों से आ रहे हैं. वे हिन्दी क्यों बोलें, ख़ासकर तब जब हिन्दी के कुछ प्रोफेसर भी हिन्दी के प्रति हीनभावना से ग्रस्त हैं.
जवाब देंहटाएंहिन्दी के लिये आप द्वारा किये गये प्रयास एवं उसके प्रतिफल से हम सबको प्रेरणा मिले।
जवाब देंहटाएंसही है .. हिंदी की खाते है बजाते ई अंग्रेजी की .....
जवाब देंहटाएंहिंदी के सिपाही को सलाम करता हूं।
जवाब देंहटाएंkisi ne kha tha ki aaj se sarkari daftro me kam hoga Hindi me ak ptra aaya hai angreji me.aapka lekh bahut hi achha likha hai.Hindi ko jo samman pana chahiye wo nhi mil pa rha hai .par aap jaise log khoya huwa samman jarur wapas layenge.
जवाब देंहटाएंहिन्दी में बोलना लोग इसलिए नही चाहते क्योकि हिन्दी में कोई समझता नही गुलामी की आदत इतनी पडी हुई है कि जो अग्रेजी बोलता है उसी की इज्जत होती है हिन्दी बोलने वालो को बेफकूफ ही समझा जाता है जिस दिन अपनी भाषा की कद्र करनी आ जायेगी उस दिन हिन्दी बोलना भी इज्जत समझी जायेगी।
जवाब देंहटाएंlambe arse ke baad kuch achha padne ko mila
जवाब देंहटाएंmanik
www.apnimaati.blogspot.com
सुनील भाई देर से बधाई के लिये क्षमा प्रार्थी हूं । हिन्दी की मशाल उठाने के लिये और राष्ट्रभाषा कि प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये आपके प्रयासों की जितनी भी सराहना की जाये कम है । हम सभी की ओर से आपको एक बार फिर ढेर सारी बधाई ।
जवाब देंहटाएंकि प्रति X
जवाब देंहटाएंके प्रति
I like your post.
जवाब देंहटाएंLatest Bollywood News in India
Current Political News in India
Latest Entertainment News in India